📚 अपौरुषेय एवं ईश्वरोक्त वाणी वेद 📚

 अपौरुषेय एवं ईश्वरोक्त वाणी वेद

 


वेदपाठ की ११ प्रकार की विधि और भेद

३ प्रकृतिपाठ में #संहितापाठ,#पदपाठ, #क्रमपाठ यह तीन प्रकार की विधि है। 

८ विकृतिपाठो में - #१जटा, #२माला, #३शिखा, #४रेखा, #५ध्वज, #६दण्ड, #७रथ, #८घन। यह आठ विकृतिपाठो की विधि है

 #जटा माला शिखा रेखा ध्वजो दण्डो रथोघनः।

#अष्टौ विकृतयः प्रोक्ताः क्रमपूर्वा महर्षिभिः॥

गुरुमुख से प्रकृतिपाठ के संहिता के अध्ययन के बाद पदपाठ और क्रमपाठ  संहिता के साथ कुल ११ प्रकार की विधि है।

३ प्रकार की विधि प्रकृति पाठ की और 

८ प्रकार की विधि  विकृतिपाठ की 

संहितापाठ + १ पदपाठ,२ क्रमपाठ,३ जटापाठ ,४ मालापाठ, ५ शिखापाठ, ६ रेखापाठ, ७ ध्वजापाठ, ८ दण्डपाठ, ९ रथपाठ, १० घनपाठ  - वेद में उच्चारणभेद तथा अर्थभेद निवारण तथा उनका शुद्धता बनाये रखने के लिए विविध प्रकार के पाठ का व्यवस्था किया गया इतने प्रकार से वेदपाठ की पद्धति वैदिक काल मे थी । महर्षियाँ युगद्रष्टा होते है । अतः उन्हें पूर्व से ही यह ज्ञात था कि भविष्य में पाठभ्रम हो सकता है । जिसकी सुरक्षा के लिए इस प्रकार के अभेद्य व्युह का निर्माण किया गया था ।

शब्दराशिको सुरक्षित तथा पूर्णतः अपरिवर्तितरूपमें मानवसमाजके कल्याणके लिये अक्षुण्ण रखनेहेतु ऋषियोंने इसकी पाठ-विधियोंका निषेधों का रहस्यों का परंपरा से उपदेश किया है जो सार्वजनिक नहीं कर सकता । ये सभी पाठ ऋषियोंके द्वारा दृष्ट हैं,अतःअपौरुषेय हैं।इनमें तीन प्रकृतिपाठ तथा आठ विकृतिपाठ हैं।  

३ प्रकृतिपाठो में - १ संहितापाठ, २ पदपाठ, और क्रमपाठ ये तीन प्रकृतिपाठ हैं। 

८ विकृतिपाठो में - १ जटा, २ माला, ३ शिखा, ४ रेखा, ५ ध्वज, ६ दण्ड,७  रथ और ८ घन। यह आठ विकृतिपाठो की विधि है

#जटा माला शिखा रेखा ध्वजो दण्डो रथोघनः।

#अष्टौ विकृतयःप्रोक्ताःक्रमपूर्वा महर्षिभिः ॥

इस प्रमाण से यह स्पष्ट होता है कि महर्षियोंने क्रमपाठ एवं विकृतिपाठोंका दर्शन करनेके अनन्तर उनका उपदेश किया। 

मधुशिक्षाके अनुसार 

#जटापाठके ऋषि व्याडि,

#मालापाठके ऋषि वसिष्ठ, 

#शिखापाठके ऋषि भृगु, 

#रेखापाठके ऋषि अष्टावक्र, 

#ध्वजापाठके ऋषि विश्वामित्र, 

#दण्डपाठके ऋषि पराशर, 

#रथपाठके ऋषि कश्यप तथा 

#घनपाठके द्रष्टा ऋषि अत्रि हैं। 

इस प्रकार ये सभी पाठ ऋषिदृष्ट होनेके कारण अपौरुषेय हैं ।इन पाठोंके द्वारा विविध प्रकारसे अभ्यास किये जानेके कारण वेदको आम्नाय ( 'आसमन्तात् म्नायते अभ्यस्यते') कहा गया है। इन विविध पाठोंकी महिमाके कारण ही आज भी मूल वेदशब्दराशि एक भी वर्ण अथवा मात्राका विपर्यय न होते हुए हमको उपलब्ध हो रही है। सम्पूर्ण ब्रह्मांड ऐसी कोई अविच्छिन्न उच्चारण-परम्परा दृष्टिगोचर नहीं 5 होती। यह वैदिक शब्दराशिका वैशिष्ट्य है।

#प्रथम प्रकृतिपाठ संहितापाठ 

#संहितापाठ मे वर्णानामेकप्राण योगः संहिता' (कात्यायन), 'परः सन्निकर्षः संहिता' (पाणिनि), आदि सूत्रोंके द्वारा संहिताका स्वरूप बतलाया गया है। वेदवाणीका प्रथमपाठ जो गुरुओंकी परम्परासे अध्ययनीय है और जिसमें वर्षों तथा पदोंकी एकश्वासरूपता अर्थात् अत्यन्त सांनिध्यके लिये सम्प्रदायानुगत सन्धियों तथा अवसानों (निश्चित स्थलोंपर विराम) से युक्त एवं उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित इन तीन स्वरोंमें अपरिवर्तनीयतासे पठनीय वेदपाठको 'संहिता' कहते हैं। इसका स्वरूप है-

#गुरुक्रमेणाध्येतव्यः ससन्धिः सावसानकः । #त्रिस्वरोऽपरिवर्त्यश्च पाठ आद्यस्तु संहिता ॥ यह संहिता का वेदपाठ पुण्यप्रदा यमुना नदीका स्वरूप है तथा संहितापाठसे यमुनाके स्रानका पुण्य मिलता है- 'कालिन्दी संहिता श्रेया' (या० शि०)। संहितारूप वेदका पाठ सूर्यलोककी प्राप्ति कराता है-'संहिता नयते सूर्यपदम्, (या० शि०)। संहितापाठ पदपाठका मूल है। 'पदप्रकृतिः संहिता' (यास्क), 'संहिता पदप्रकृतिः' (दुर्गाचार्य) आदि वचनोंके आधारपर यह प्रथम प्रकृतिपाठ है। ऋषियोंने मन्त्रोंके संहितारूप वेदपाठका ही दर्शन किया और यज्ञ, देवता-स्तुति आदि कार्योंमें वेदके संहितापाठका प्रयोग किया जाता है। कहा भी गया है- =»'#आचार्याः सममिच्छन्ति पदच्छेदं तु पण्डिताः। संहिता प्रथम प्रकृतिपाठ है।

२ पदपाठ - संहिता पाठ से कठिन पदपाठ होता है, पदपाठ तथा उसकी महिमा 'अर्थः पदम् वा० प्रा०), 'सुप्तिङन्तं पदम्' (पाणिनि) आदि सूत्रोंके द्वारा पदका स्वरूप बतलाया गया है। इसका तात्पर्य है कि किसी अर्थका बोध करानेके लिये पाणिनीय आदि व्याकरणके अनुसार 'सुप्-तिङ्' आदि प्रत्ययोंसे युक्त वर्णात्मक इकाईको 'पद' कहते हैं। वेदके संहितापाठकी परम्पराके अनुसार स्वरवर्णोंकी सन्धिका विच्छेद करके वैदिक मन्त्रोंका सस्वर पाठ पदपाठ कहा जाता है।

वेदके संहितापाठका जिन ऋषियोंने दर्शन किया, उनका स्मरण विनियोग आदिमें किया जाता है। वस्तुतः सर्वप्रथम परमेश्वरने ही वेदशब्द-संहिताका दर्शन किया - तथा उन्होंने इसका उपदेश किया। इसी प्रकार पदपाठके आद्य द्रष्टा #रावण और क्रमपाठके बाभ्रव्य ऋषि हैं। मधुशिक्षाका वचन है-

#भगवान् संहितां प्राह पदपाठं तु रावणः । #बाभ्रव्यर्षिःक्रमं प्राह जटां व्याडिरवोचत् ॥

प्रत्येक शाखाके पृथक् पदपाठके ऋषि भी उल्लिखित हैं, यथा---

#ऋग्वेदकी शाकलशाखाके शाकल्य, #यजुर्वेदकी तैत्तिरीय शाखाके आत्रेय तथा #सामवेदकी कौथुमशाखाके गार्ग्य ऋषि पदपाठके द्रष्टा हैं। 

इसी प्रकार प्रातिशाख्यमें पदपाठ मे वेदों के मंत्रों को भिन्न पदों में विभाजित करके पढ़ा जाता है, प्रत्येक पद को अलग-अलग पढ़ाने के कारण वेदाध्ययन के मंत्रों का अर्थ और उच्चारण शुद्धि स्पष्टोच्चारण होता है। यह पाठ पुण्यप्रदा देवनदी सरस्वती का स्वरूप है इसलिए सरस्वती में स्नान करने का फल मिलता है। 'नवपदशय्या: एकादश पदभक्तय:' (या० शि० ) पदमुक्ता सरस्वती इस पाठ से चंद्रलोक की प्राप्ति होती है। पदं च शशिनः पदम्' (या० शि०)।एतरेय आरण्यकानुसार (३-१-३)  पदपाठ स्वर्गकामना की पूर्ति के लिए किया जाता है। यह ऋग्वेद प्रतिवर्गद्वय वृत्ति शाख्यानुसार है

वाराहपुराण अनुसार पदपाठ से तीन गुना पुण्य प्राप्त होता है। पदं च शशिनः पदम्' (या० शि०)। विद्वज्जन अर्थज्ञानकी सुविधाके लिये पदपाठको विशेषरूपसे ग्रहण करते हैं। वेदमन्त्रोंके पदपाठसे आराध्य देवके गुणोंका गान किया जाता है। तैत्तिरीय आदि अनेक शाखाओंमें संहिताके प्रत्येक पदका पदपाठमें साम्प्रदायिक उच्चारण है। ऋग्वेदमें भिन्न पदगर्भित पदोंमें अनानुपूर्वी संहिताको स्पष्ट पद-स्वरूप देकर पढ़ा जाता है। #शुक्लयजुर्वेदकी शाखाओंमें प्रातिशाख्यके नियमोंके अनुसार एकाधिक बार आये हुए विशेष पदोंको पदपाठमें विलुप्त कर दिया जाता है। शास्त्रीय परिभाषामें ऐसे विलुप्त पदोंको गलत्पद तथा ऐसे स्थलके पाठको संक्रम कहा जाता है। पदपाठमें प्रत्येक पदको अलग करनेके साथ यदि कोई पद दो पदोंके समाससे बना हो तो उसे माध्यन्दिनीय शाखामें 'इतिकरण' के साथ दोहरा करके स्पष्ट किया जाता है। प्रातिशाख्यके नियमोंके अनुसार कतिपय विभक्तियोंमें तथा वैदिक लोप, आगम, वर्णविकार, प्रकृतिभाव आदिमें भी 'इतिकरण' के साथ पदका मूल स्वरूप स्पष्ट किया जाता है। पदपाठमें स्वरवर्णोंकी सन्धिका विच्छेद तथा अवग्रह आदि विशेष विधियोंके प्रभावसे यह पाठ संहितासे भी अधिक कठिन हो जाता है। इन नियमोंके कारण ही यह पदच्छेद नहीं है, किंतु पदपाठ कहा जाता है। विकृतिपाठों का अध्ययनाध्यापन भी प्रचलित है । चरणव्यूह आदि ग्रन्थोंके (वारे शास्त्री प्रभृतिद्वारा सम्पादित) प्रामाणिक संस्करणोंमें विकृतियोंका उल्लेख होने के कारण अन्य शाखाओंमें भी विकृतिपाठ करना अत्यन्त प्रामाणिक है। 

स्कन्दपुराणके ब्रह्मखण्डानुसार- जगत्‌की आधारभूता वेदात्मिका गौ जटा-घन आदि विकृतियोंसे विभूषित है।

#सर्वस्याधारभूताया वत्सधेनुस्त्रयीमयी। 

#अस्यां प्रतिष्ठितं विश्वं विश्वहेतुश्च या मता ॥ #ऋक्पृष्ठासौ यजुर्मध्या सामकुक्षिपयोधरा। #इष्टापूर्तविषाणा च साधुसूक्ततनूरुहा ।। #शान्तिपुष्टि शकृन्मूत्रा वर्णपादप्रतिष्ठिता।

#उपजीव्यमाना जगतां पदक्रमजटाघनैः ।।

इसके द्वारा चतुर्वेदात्मिका त्रयीवाणी जटा-घन आदि विकृतिपाठोंसे प्राणियोंपर अनुग्रह करती है, यह स्पष्ट निर्देश है। विकृतिपाठ-सम्बन्धी इन वचनोंको वैदिक परम्परामें प्रामाणिक माना जाता है; क्योंकि वेदसम्मत स्मृतिवचनों तथा आचारोंका प्रामाण्य मीमांसा एवं धर्मशास्त्रमें सर्वांशतः माना गया है।

३ क्रमपाठ -  अपृक्त आदि विशेष स्थलों को छोड़कर दो दो पदों का सन्धि युक्त अवसान पर्यंत पाठ ही क्रम पाठ सिद्ध है संपूर्ण अध्याय के मंत्र क्रम का पुनरावर्तन करके आत्मसात करने के लिए पढ़ा जाता है । 

#द्वे द्वे पदे सन्दधात्युत्तरेणोत्तरभावसानमपृक्तवर्जनम् (वा०प्र०) आदि सूत्रों से क्रमपाठ का बोध होता है पाणिनि के धातुपाठ के अनुसार क्रमपाठ में भी एक एक पद को आगे बढ़ाकर पढने के कारण ही यह क्रमपाठ का बोध होता है। क्रमपाठ के दृष्टा #बाभ्रव्य ऋषि है।

प्रथम तीनप्रकार प्रकृतिपाठ और ८प्रकार विकृतिपाठ से वेदपाठ की विधि है - 


१संहिता,२पदपाठ,३क्रमपाठ ,५जटापाठ ,५मालापाठ,६शिखापाठ, ७रेखापाठ, ८ध्वजापाठ, ९दण्डपाठ, १०रथपाठ, ११घनपाठ 

८ विकृतिपाठो में - १ जटा, २ माला, ३ शिखा, ४ रेखा, ५ ध्वज, ६ दण्ड,७  रथ और ८ घन। यह आठ विकृतिपाठो की विधि है

#जटा माला शिखा रेखा ध्वजो दण्डो रथोघनः।

#अष्टौ विकृतयःप्रोक्ताःक्रमपूर्वा महर्षिभिः ॥

इस प्रमाण से यह स्पष्ट होता है कि महर्षियोंने क्रमपाठ एवं विकृतिपाठोंका दर्शन करनेके अनन्तर उनका उपदेश किया।  मधुशिक्षाके अनुसार 

#जटापाठके ऋषि व्याडि,

#मालापाठके ऋषि वसिष्ठ, 

#शिखापाठके ऋषि भृगु, 

#रेखापाठके ऋषि अष्टावक्र, 

#ध्वजापाठके ऋषि विश्वामित्र, 

#दण्डपाठके ऋषि पराशर, 

#रथपाठके ऋषि कश्यप तथा 

#घनपाठके द्रष्टा ऋषि अत्रि हैं। 

इस प्रकार ये सभी पाठ ऋषिदृष्ट होनेके कारण अपौरुषेय हैं ।इन पाठोंके द्वारा विविध प्रकारसे अभ्यास किये जानेके कारण वेदको आम्नाय ( 'आसमन्तात् म्नायते अभ्यस्यते') कहा गया है। इन विविध पाठोंकी महिमाके कारण ही आज भी मूल वेदशब्दराशि एक भी वर्ण अथवा मात्राका विपर्यय न होते हुए हमको उपलब्ध हो रही है। सम्पूर्ण ब्रह्मांड ऐसी कोई अविच्छिन्न उच्चारण-परम्परा दृष्टिगोचर नहीं 5 होती। यह वैदिक शब्दराशिका वैशिष्ट्य है।

#१जटापाठ - जटापाठ इस प्रथम विकृतिपाठमें दो पदोंको अनुक्रम तथा संक्रम इस प्रकार तीन बार सन्धिपूर्वक अवसानरहित पढ़ा जाता है। 

जैसे- 'विष्णोः', कर्माणि विष्णोर्विष्णोः कर्माणि।' इत्यादि। जटापाठ पञ्चसन्धियुक्त भी होता है। इसमें अनुक्रम, उत्क्रम, व्युत्क्रम, अभिक्रम तथा संक्रम-ये पाँच क्रम होते हैं। पदोंको संख्याके साथ प्रदर्शित करते हुए इसका स्वरूपे इस प्रकार है-'विष्णोः कर्माणि (अनुक्रम), कर्माणि, कर्माणि (उत्क्रम), कर्माणि विष्णोः (व्युत्क्रम), विष्णोर्विष्णोः (अभिक्रम) और विष्णोः कर्माणि (संक्रम)।'क्रमपाठ की विधि में भेद करके आत्मसात करने के लिए जटापाठ उपयुक्त है जो आत्मसंयम और ध्यान की शक्ति को बढ़ाता है।

#२मालापाठ -  इसके दो भेद हैं- 

#१ पुष्पमाला, #२ क्रममाला। 

अधिक प्रचलित पुष्पमालापाठमें जटाकी भाँति ही तीनों क्रम पढ़े जाते हैं, किंतु प्रत्येकके बीचमें विराम किया जाता है। जैसे- 'विष्णोः कर्माणि। कर्माणि विष्णोः। विष्णोः कर्माणि।' इत्यादि।

#३शिखापाठ - जटापाठके त्रिविध क्रमोंके बाद एक आगेका पद ग्रहण करनेपर शिखापाठ हो जाता है।जैसे- 'विष्णोः कर्माणि कर्माणि विष्णोर्विष्णोः कर्माणि पश्यत।' इत्यादि। 

#प्रथम अनुक्रम - विष्णोः कर्माणि। यतो व्रतानि।इन्द्रस्य युज्यः ।इन्द्रस्य। 

व्युत्क्रम-कर्माणि विष्णोः। व्रतानि यतः। युज्य

#द्वितीय अनुक्रम - विष्णोः कर्माणि। यतो व्रतानि।

#४रेखापाठ - रेखापाठ में आधी ऋचा अथवा सम्पूर्ण ऋचाके दो पदोंका क्रमपाठ, तीन पदोंका क्रमपाठ, चार पदोंका क्रमपाठ-इस प्रकार क्रमशः किया जाता है। इसी प्रकार व्युत्क्रममें भी करनेके बाद संक्रममें दो दो पदोंका ही पाठ होता है। प्रत्येक क्रमके आरम्भमें एक पूर्ववर्तिपद छोड़ते हुए अवसानपूर्वक यह पाठ होता है। जैसे- ओषधयः सं। समोषधयः । ओषधयः सं ॥ सं वदन्ते सोमेन। सोमेन वदन्ते सं। सं वदन्ते ॥ वदन्ते सोमेन सह राज्ञा। राज्ञा सह सोमेन वदन्ते। वदन्ते सोमेन । सोमेन सह। सह राज्ञा। इत्यादि

#५ ध्वजपाठ - ध्वजपाठ इसके अन्तर्गत प्रथम दो पदोंका क्रम तथा अन्तिम पदोंका क्रम, इस प्रकार साथ-साथ आदिसे अन्त और अन्तसे आदितक पाठ होता है। यह एक मन्त्रमें अथवा एक वर्गमें आदिसे अन्ततक हो सकता है। जैसे- ओषधयः सं। पारयामसीति पारयामसि। सं वदन्ते। राजन् पारयामसि। वदन्ते सोमेन। तं राजन्। इत्यादि।

#६दण्डपाठ-  दण्डपाठ अनुक्रमसे दो पदोंके पाठके अनन्तर व्युत्क्रममें क्रमशः एक-एक पद बढ़ाते हुए पाठ करना दण्डपाठ है। यह विधि अर्धचंतक चलती है। जैसे 'ओषधयः सं। समोषधयः। ओषधयः सं। सं वदन्ते ॥ वदन्ते समोषधयः । ओषधयः सं। सं वदन्ते। वदन्ते सोमेन ॥ सोमेन वदन्ते समोषधयः ।' इत्यादि ।

#७रथपाठ - रथपाठ के तीन भेद हैं- १द्विचक्र, २ त्रिचक तथा ३ चतुश्चक्र। 

१द्विचक्र रथ अर्धचंशः होता है। 

२त्रिचक्र रथ समानपद संख्यावाले तीन पदोंकी गायत्री छन्दकी ऋचामें ही पादशः होता है। 

३चतुश्चक्र रथ भी पादशः होता है। 

त्रिचक्र रथका उदाहरण यह है-#प्रथम अनुक्रम - विष्णोः कर्माणि। यतो व्रतानि। इन्द्रस्य युज्यः ।

#व्युत्क्रम - कर्माणि विष्णोः। व्रतानि यतः। युज्य इन्द्रस्य।

#द्वितीय अनुक्रम - विष्णोः कर्माणि। यतो व्रतानि। इन्द्रस्य युज्यः। कर्माणि पश्यत। व्रतानि पस्पशे। युज्यः सखा।

#व्युत्क्रम - पश्यत कर्माणि विष्णोः । पस्पशे व्रतानि यतः। सखा युज्य इन्द्रस्य। इत्यादि

#८घनपाठ - घनपाठ-वैदिक विद्वानोंमें सर्वाधिक समादृत घनपाठ भी चार प्रकारका है। घनके दो भेद तथा घनवल्लभके भी दो भेद हैं। घनपाठमें शिखापाठ करके उसका विपर्यास करनेके बाद पुनः उन तीन पदोंका पाठ किया जाता है। जैसे 'ओषधयः सं समोषधय ओषधयः सं वदन्ते वदन्ते समोषधय ओषधयः सं वदन्ते ॥' इत्यादि। घनवल्लभमें पञ्चसन्धियुक्त पाठ होता है। अनुक्रम, उत्क्रम, व्युत्क्रम, अभिक्रम और संक्रम- इन पाँच प्रकारकी सन्धियोंसे युक्त होनेके कारण इसे पञ्चसन्धियुक्त घन भी कहते हैं। इसका उदाहरण इस प्रकार है-

'पावका नः। नो नः। नः पावका। पावका पावका। पावकानः। पावका नो नः पावका पावका नः सरस्वती सरस्वती नः पावका पावका नः सरस्वती।' इत्यादि।

वेदपाठ के प्रकारभेद ।

वेद में उच्चारणभेद तथा अर्थभेद निवारण तथा उनका शुद्धता बनाये रखने के लिए विविध प्रकार के पाठ का व्यवस्था किया गया है । वह इसप्रकार के हैं -

#संहितापाठ

1- पदपाठ ।

2- क्रम पाठ ।

3-जटा पाठ ।

4-घनपाठ ।

5-माला पाठ ।

6- शिखापाठ ।

7-रेखापाठ ।

8-ध्वजापाठ ।

9-दण्डपाठ ।

10-रथपाठ ।

इतने प्रकार से वेदपाठ की पद्धति वैदिक काल मे थी । महर्षियाँ युगद्रष्टा होते है । अतः उन्हें पूर्व से ही यह ज्ञात था कि भविष्य में पाठभ्रम हो सकता है । जिसकी सुरक्षा के लिए इस प्रकार के अभेद्य व्युह का निर्माण किया गया था ।




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