मणिग्रीव उवाच :-
चमत्कारपुरे रम्ये विद्वज्जनसमाकुले, मम वासोऽभवत्तत्र धर्मपत्न्याक सह द्विज ॥ १ ॥
धनाढयस्य पवित्रस्य परोपकृतिशालिनः, कदाचिद्दैवयोगेन दुर्बुद्धिः समपद्यत ॥ २ ॥
निजधर्मपरित्यागः कृता मे दुष्टबुद्धिना, परस्त्रीसेवनं नित्यमपेयं पीयते स्म ह ॥ ३ ॥
चौर्यहिंसापरश्चाहं परित्यक्तः स्वबन्धुभिः, बृहद्बलेन भूपेन मद्गृहं लुण्ठितं तदा ॥ ४ ॥
अवशिष्टंस च यत्किञ्चिद् गृहीतं बन्धुभिर्धनम्, एवं तिरस्कृतः सर्वैर्वनवासमचीकरम् ॥ ५ ॥
कृत्वा जीववधं नित्यं जीवेयं भार्यया सह, एतस्मिन्विपिने घोरे वसतो मे दुरात्मनः ॥ ६ ॥
कुरुष्वानुग्रहं ब्रह्मन् पापयुक्तस्य साम्प्रतम्, प्राचीनपुण्यपुञ्जेुन सम्प्राप्तो गहने भवान् ॥ ७ ॥
हिंदी अनुवाद :-
मणिग्रीव बोला – हे द्विज! विद्वानों से पूर्ण और सुन्दर चमत्कारपुर में धर्मपत्नी के साथ में रहता था ॥ १ ॥
धनाढय, पवित्र आचरण वाला, परोपकार में तत्पर मुझको किसी समय संयोग से दुष्ट बुद्धि पैदा हुई ॥ २ ॥
दुष्ट बुद्धि के कारण मैंने अपने धर्म का त्याग किया, दूसरे की स्त्री का सेवन किया और नित्य अपेय वस्तु का पान किया ॥ ३ ॥
चोरी हिंसा में तत्पर रहता था, इसलिए बन्धुओं ने मेरा त्याग किया। उस समय महाबलवान् राजा ने मेरा घर लूट लिया ॥ ४ ॥
बाद बचा हुआ जो कुछ धन था उसको बन्धुओं ने ले लिया, इस प्रकार सभी से तिरस्कृत होने के कारण वन में निवास किया ॥ ५ ॥
स्त्री के साथ इस घोर वन में निवास करते हुए मुझ दुरात्मा का नित्य जीवों का वध कर जीवन-निर्वाह होता है ॥ ६ ॥
हे ब्रह्मन्! इस समय आप मुझ पातकी पर अनुग्रह करें, प्राचीन पुण्य के समूह से आप इस घोर वन में आये हैं ॥ ७ ॥
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तवाहं शरणं यातः सपत्नीको महामुने, उपदेशप्रसादेन कृतार्थीकर्तुमर्हसि ॥ ८ ॥
येन मे तीव्रदारिद्रयं विलयं याति तत्क्षणात्, अतुलं वैभवं लब्ध्वा विचरामि यथासुखम् ॥ ९ ॥
उग्रदेव उवाच :-
कृतार्थोऽसि महाभाग यदातिथ्यं कृतं मम, अतस्ते भावि कल्याणं सपत्नीकस्य साम्प्रतम् ॥ १० ॥
विना व्रतैर्विना तीर्थैर्विना दानैरयत्नतः, दारिद्रयं ते लयं याति यथा निर्धारितं मया ॥ ११ ॥
अतः परं तृतीयोऽस्ति मासः श्रीपुरुषोत्तमः, भवद्भयां तत्र विधिना दम्पतीभ्यां प्रयत्न तः ॥ १२ ॥
कर्तव्यं दीपदानं च पुरुषोत्तमतुष्टये, तेन ते तीव्रदारिद्रयं समूलं नाशमेष्यति ॥ १३ ॥
तिलतैलेन कर्तव्यः सर्पिषा वैभवे सति, तयोर्मध्ये न किञ्चित्ते कानने वसतोऽधुना ॥ १४ ॥
इङ्गुदीजेन तैलेन दीपः कार्यस्त्वयाऽनघ, यावन्मासं सनियमं मणिग्रीव स्त्रिया सह ॥ १५ ॥
हिंदी अनुवाद :-
हे महामुने! स्त्री के साथ मैं आपकी शरण में आया हूँ, आप उपदेशरूप प्रसाद से कृतार्थ करने के योग्य हैं ॥ ८ ॥
जिस उपाय के करने से मेरी तीव्र दरिद्रता इसी क्षण में नष्ट हो जाय और अतुल वैभव को प्राप्त कर यथासुख विचरूँ ॥ ९ ॥
उग्रदेव बोला – हे महाभाग! तुम कृतार्थ हो गये, जो तुमने मेरा अतिथि-सत्कार किया इसलिए इस समय स्त्रीसहित तुमको होनेवाले कल्याण को कहता हूँ ॥ १० ॥
जो बिना व्रत के, बिना तीर्थ के, बिना दान के, बिना प्रयास के तुम्हारी दरिद्रता दूर हो जायगी, ऐसा मैंने विचार किया है ॥ ११ ॥
इसके बाद तीसरा श्रीपुरुषोत्तम मास आने वाला है उस पुरुषोत्तम मास में सावधानी के साथ विधिपूर्वक तुम दोनों स्त्री-पुरुष ॥ १२ ॥
श्रीपुरुषोत्तम भगवान् को प्रसन्न करने के लिये दीप-दान करना, उस दीप-दान से तुम्हारी यह दरिद्रता जड़ से नष्ट हो जायगी ॥ १३ ॥
तिल के तेल से दीप-दान करना चाहिये, विभव के होने पर घृत से दीप-दान करना चाहिये, परन्तु इस समय वन में वास करने के कारण घृत अथवा तेल इनमें से तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है ॥ १४ ॥
हे अनघ! मणिग्रीव! पुरुषोत्तम मास भर स्त्री के साथ नियमपूर्वक इंगुदी के तेल से तुम दीप-दान करना ॥ १५ ॥
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अस्मिन्सरोवरे स्नात्वा सह पत्न्याव निरन्तरम्, एवमेव हि कर्तव्यं मासमात्रं त्वया वने ॥ १६ ॥
अयमेवोपदेशस्तु सपत्नी्काय मे कृतः, त्वादातिथ्यप्रसन्नेन मया निगमनिश्चितः ॥ १७ ॥
अवैधं दीपदानं हि रमावृद्धिकरं नृणाम्, विधिना कियमाणं चेत्किं पुनः पुरुषोत्तमे ॥ १८ ॥
वेदोक्तानि च कर्माणि दानानि विविधानि च, पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ १९ ॥
तीर्थानि सकलान्येव शास्त्राणि सकलानि च, पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २० ॥
योगो ज्ञानं तथा साङ्ख्यं तन्त्राणि सकलान्यपि, पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २१ ॥
कृच्छ्रचान्द्रायणादीनि व्रतानि निखिलानि च, पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २२ ॥
वेदाभ्यासो गयाश्राद्धं गोमतीतटसेवनम्, पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २३ ॥
उपरागसहस्राणि व्यतीपातशतानि च, पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २४ ॥
हिंदी अनुवाद :-
स्त्री के साथ इस तालाब में नित्य स्नान करके दीप-दान करना, इसी प्रकार तुम इस वन में एक मास व्रत करना ॥ १६ ॥
तुम्हारे अतिथिसत्कार से प्रसन्न मैंने यह वेद में कहा हुआ तुम दोनों स्त्री-पुरुष के लिये उपदेश किया है ॥ १७ ॥
विधिहीन भी दीप-दान करने से मनुष्यों को लक्ष्मी की वृद्धि होती है, यदि पुरुषोत्तम मास में विधिपूर्वक दीप-दान किया जाय तो क्या कहना है ॥ १८ ॥
वेद में कहे हुए कर्म और अनेक प्रकार के दान पुरुषोत्तम मास में दीप-दान की सोलहवीं कला की भी बराबरी नहीं कर सकते हैं ॥ १९ ॥
समस्त तीर्थ, समस्त शास्त्र पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला को नहीं पा सकते हैं ॥ २० ॥
योग, दान, सांखय, समस्त-तन्त्र भी पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला को नहीं पा सकते हैं ॥ २१ ॥
कृच्छ्र, चान्द्रायण आदि समस्त व्रत पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला की बराबरी नहीं कर सकते हैं ॥ २२ ॥
वेद का प्रतिदिन पाठ करना, गयाश्राद्ध, गोमती नदी के तट का सेवन पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला की बराबरी नहीं कर सकते ॥ २३ ॥
हजारों ग्रहण, सैकड़ों व्यतीपात पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला की बराबरी नहीं कर सकते हैं ॥ २४ ॥
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कुर्वादिक्षेत्रवर्याणि दण्डकादिवनानि च, पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २५ ॥
एतद्गुह्यतमं वत्स नाख्येयं यस्य कस्यचित्, धनधान्यपशुव्रातपुत्रपौत्रयशस्करम् ॥ २६ ॥
वन्ध्यावन्ध्यत्वशमनमवैधव्यकरं स्त्रियाः, राज्यदं राज्यभ्रष्टस्य चिन्तितार्थकरं नृणाम् ॥ २७ ॥
कन्या विन्देत भर्त्तारं गुणिनं चिरजीविनम्, कान्तार्थी लभते कान्तां सुशीलां च पतिव्रताम् ॥ २८ ॥
विद्यार्थी लभते विद्यां सुसिद्धिं सिद्धिकामुकः, कोशकामो लभेत् कोशं मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात् ॥ २९ ॥
विना विधिं विना शास्त्रं यः कुर्यात् पुरुषोत्तमे, दीपं तु यत्र कुत्रापि कामितं सर्वमाप्नुयात् ॥ ३० ॥
किं पुनर्विधिना वत्स दीपं कुर्यात् प्रयत्नरतः, तस्माद्दीपः प्रकर्तव्या मासे श्रीपुरुषोत्तमे ॥ ३१ ॥
एतदुक्तं मया तेऽद्य तीव्र दारिद्रयनाशनम्, स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सन्तुष्टः सेवया तव ॥ ३२ ॥
हिंदी अनुवाद :-
कुरुक्षेत्र आदि श्रेष्ठ क्षेत्र, दण्डक आदि वन पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला की बराबरी नहीं कर सकते हैं ॥ २५ ॥
हे वत्स! यह अत्यन्त गुप्त व्रत जिस किसी से कहने लायक नहीं है, यह धन, धान्य, पशु, पुत्र, पौत्र और यश को करनेवाला है ॥ २६ ॥
वन्ध्या स्त्री के बाँझपन को नाश करनेवाला है और स्त्रियों को सौभाग्य देनेवाला है, राज्य से गिरे हुए राजा को राज्य देनेवाला है और प्राणियों को इच्छानुसार फल देनेवाला है ॥ २७ ॥
यदि कन्या व्रत करती है तो गुणी चिरञ्जीयवी पति को प्राप्त करती है, स्त्री की इच्छा करने वाला पुरुष सुशीला और पतिव्रता स्त्री को प्राप्त करता है ॥ २८ ॥
विद्यार्थी विद्या को प्राप्त करता है, सिद्धि को चाहने वाला अच्छी तरह सिद्धि को प्राप्त करता है, खजाना को चाहने वाला खजाना को प्राप्त करता है, मोक्ष को चाहने वाला मोक्ष को प्राप्त करता है ॥ २९ ॥
बिना विधि के, बिना शास्त्र के जो पुरुषोत्तम मास में जिस किसी जगह दीप-दान करता है वह इच्छानुसार फल को प्राप्त करता है ॥ ३० ॥
हे वत्स! विधिपूर्वक नियम से जो दीप-दान करता है तो फिर कहना ही क्या है? इसलिये पुरुषोत्तम मास में दीप-दान करना चाहिये ॥ ३१ ॥
मैंने इस समय यह तीव्र दरिद्रता को नाश करने वाला दीप-दान तुमसे कहा, तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारी सेवा से मैं प्रसन्न हूँ ॥ ३२ ॥
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अगस्त्य उवाच :-
इत्युक्त्वा विप्रवर्योऽसौ प्रयागं सञ्जगाम ह, द्विभुजं मुरलीहस्तं मनसा श्रीहरिं स्मरन् ॥ ३३ ॥
अनुगत्वोग्रदेवं तं कियन्मासं निजाश्रमात्, पुनरावव्रतुर्नत्वा दम्पती हृष्टमानसौ ॥ ३४ ॥
आसाद्य स्वाश्रमं भक्त्या पुरुषोत्तममानसौ, निन्यतुर्मासयुगलं द्विजभक्तिपरायणौ ॥ ३५ ॥
गते मासद्वये श्रीमानागतः पुरुषोत्तमः, तौ तस्मिंश्चक्रतुर्दीपं गुरुभक्तिपरायणौ ॥ ३६ ॥
इङ्गुदीजेन तैलेन वैभवार्थमतन्द्रितौ, एवं तयोः कृतवतोर्जगाम पुरुषोत्तमः ॥ ३७ ॥
उग्रदेवप्रसादेन विनिर्धूतमनोमलौ, कालस्य वशमापन्नौ पुरन्दरपुरीं गतौ ॥ ३८ ॥
तत्रत्यं भोगमासाद्य पृथिव्यां भारताजिरे, उग्रदेवप्रसादेन वरं जनुरवापतुः ॥ ३९ ॥
वीरबाहुसुतस्त्वं च चित्रबाहुरिति श्रुतः, पूर्वस्मिन्यो मणिग्रीवो मृगहिंसापरायणः ॥ ४० ॥
हिंदी अनुवाद :-
अगस्त्य मुनि बोले – इस प्रकार वह श्रेष्ठ ब्राह्मण मन से दो भुजावाले मुरली को धारण करने वाले श्रीहरि भगवान् का स्मरण करते हुए प्रयाग को गये ॥ ३३ ॥
वे दोनों अपने आश्रम से उग्रदेव के पीछे जाकर उनके पास कुछ मासपर्यन्त वास करके, प्रसन्न मन हो, दोनों स्त्री-पुरुष उग्रदेव को नमस्कार कर, फिर अपने आश्रम को चले आये ॥ ३४ ॥
अपने आश्रम में आकर भक्ति से पुरुषोत्तम में मन लगाकर, ब्राह्मण की भक्ति में तत्पर उन दोनों स्त्री-पुरुष ने दो मास बिताया ॥ ३५ ॥
दो मास बीत जाने पर श्रीमान् पुरुषोत्तम मास आया, उस पुरुषोत्तम मास में वे दोनों गुरुभक्ति में तत्पर हो दीप-दान को करते हुए ॥ ३६ ॥
आलस्य को छोड़कर वे दोनों ऐश्वर्य के लिए इंगुदी के तेल से दीप-दान करते रहे, इस प्रकार दीप-दान करते उन दोनों को श्रीपुरुषोत्तम मास बीत गया ॥ ३७ ॥
उग्रदेव ब्राह्मण के प्रसाद से शुद्धान्तःकरण होकर समय पर काल के वशीभूत हो इन्द्र की पुरी को गये ॥ ३८ ॥
वहाँ होनेवाले सुखों को भोग कर पृथिवी पर भारतखण्ड में उग्रदेव के प्रसाद से श्रेष्ठ जन्म को उन दोनों स्त्री-पुरुष ने धारण किया ॥ ३९ ॥
पूर्व जन्म में जो तुम मृग की हिंसा में तत्पर मणिग्रीव थे वह वीरबाहु के पुत्र चित्रबाहु नाम से प्रसिद्ध राजा हुए ॥ ४० ॥
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इयं चन्द्रकला नाम्नी महिषी याऽधुना तव, सुन्दरीति समाख्याता पुनर्जनुषि तेऽङ्गना ॥ ४१ ॥
पातिव्रत्येन धर्मेण तवाद्याङ्गार्धहारिणी, पतिव्रता हि या नारी पतिपुण्यार्धभागिनी ॥ ४२ ॥
कृतेन दीपदानेन मासे श्रीपुरुषोत्तमे, इङ्गुदीजेन तैलेन तव राज्यमकण्टकम् ॥ ४३ ॥
किं पुनः सर्पिषा दीपं तिलतैलेन वा पुनः, यः करोति ह्यखण्डं वै मासे श्रीपुरुषोत्तमे ॥ ४४ ॥
पुरुषोत्तमदीपस्य फलमेतन्न संशयः, किं पुनश्चोपवासाद्यैश्चरतः पुरुषोत्तमम् ॥ ४५ ॥
बाल्मीकिरुवाच :-
चित्रबाहुचरितं पुरातनं सन्निरूप्य कलशोद्भवो मुनिः, सत्कृति समधिगम्य तत्कृतामक्षयाशिषमुदीर्य निर्ययौ ॥ ४६ ॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे दृढधन्वोपाख्याने दीपमाहात्म्यकथनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
हिंदी अनुवाद :-
इस समय यह चन्द्रकला नामक जो तुम्हारी स्त्री है वह पूर्व जन्म में सुन्दरी नाम से तुम्हारी स्त्री थी ॥ ४१ ॥
पतिव्रत धर्म से यह तुम्हारे अर्धांग की भागिनी है, जो स्त्री पतिव्रता होती हैं वे अपने पति के पुण्य का आधा भाग लेनेवाली होती हैं ॥ ४२ ॥
श्रीपुरुषोत्तम मास में इंगुदी के तेल से दीप-दान करने से तुमको यह निष्कण्टक राज्य मिला ॥ ४३ ॥
जो पुरुष श्रीपुरुषोत्तम मास में घृत से अथवा तिल के तेल से अखण्ड दीप-दान करता है तो फिर कहना ही क्या है ॥ ४४ ॥
पुरुषोत्तम मास में दीप-दान का यह फल कहा है इसमें कुछ सन्देह नहीं है, जो उपवास आदि नियमों से श्रीपुरुषोत्तम मास का सेवन करता है तो उसका कहना ही क्या है ॥ ४५ ॥
बाल्मीकि मुनि बोले – इस प्रकार अगस्त्य मुनि राजा चित्रबाहु के पूर्व जन्म का वृत्तान्त कहकर और राजा चित्रबाहु से किए गये सत्कार को लेकर तथा अक्षय आशीर्वाद देकर चले गये ॥ ४६ ॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे दृढ़धन्वोपाख्याने दीपमाहात्म्य कथनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
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